प्राचीन भारत का इतिहास

भारतीय इतिहास के स्त्रोत

भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है समयानुसार भारत देश अनेक नामों से जाना जाता रहा है। यूनानियों ने  भारत और इंडिया कहा तो अरब, इरानियो ने हिंदुस्तान। मत्स्यपुराण में भारत के 9 भाग बताए गए हैं - इंद्रद्विप, कसेरू, ताम्रपर्णी, त्रआंसतीमा नागद्वीप, सौम्य, गंधर्व , वारुष तथा सागर।

प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए शुद्ध ऐतिहासिक सामग्री अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कमत उपलब्ध है। भारत में यूनानी के हीरोडाटस या रोम  के लिवी जैसे इतिहास लेखक नहीं हुए, इसलिए कुछ पाश्चात्य विद्वानों की यह धारणा बन गई थी कि भारतीयों को इतिहास की ठीक संकल्पना ही नहीं थी। ऐसा समझना भारी भूल है। वस्तु स्थिति यह है कि प्राचीन भारतीयों की इतिहास की संकल्पना आधुनिक इतिहासकारों की संकल्पना से पूर्णतया भिन्न थी। आजकल का इतिहासकार ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन में  कार्य - कारण  संबंध स्थापित करने का प्रयत्न करता है, किंतु प्राचीन इतिहासकार  केवल उन घटनाओं का वर्णन करता था। जिनसे जनसाधारण को कुछ शिक्षा मिल सके। महाभारत में इतिहास की जो परिभाषा दी है उससे भारतीयों की ऐतिहासिक विषयक संकल्पना पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस ग्रंथ के अनुसार ऐसी प्राचीन रुचिकर कथा जिससे धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष की शिक्षा मिल सके इतिहास कहलाती हैं। प्राचीन काल में भारत वासी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थ को जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक समझते थे। इन पुरुषार्थ को करने की प्रेरणा देने में इतिहास भी एक साधन था, इसलिए प्राचीन भारतीय इतिहास का उन घटनाओं को कोई महत्व नहीं देते थे जिससे इन चारों पुरुषार्थ ही शिक्षा मिल सके। इसलिए प्राचीन भारत का इतिहास राजनीतिक कम और सांस्कृतिक अधिक है। भारतीय समाज के निर्माण में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान रहा है, किंतु धर्म के अतिरिक्त अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक कारण थे, जिन्होंने भारत में अनेक आंदोलन, संस्थाओं और विचारधाराओं को जन्म दिया। भारतीय इतिहास का यथार्थ स्वरूप जानने के लिए इन सब का अध्याय अध्ययन आवश्यक है।

आधुनिक इतिहासकार  काल विशेष से संबंध रखने वाली  साहित्यइक तथा पुरातात्विक सभी सामग्री का उपयोग करके सही चित्र प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है। साहित्यिक स्रोतों का उपयोग करते समय वह उस विचारधारा का ध्यान रखता है जिस से प्रेरित होकर लेखक ने अपने ग्रंथ की रचना की थी। उदाहरण के लिए आर्य मंजु श्री मूल कल्प के लेखक का, अपना ग्रंथ लिखते समय मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म का इतिहास लिखना था। इसलिए उसने बौद्ध धर्म के संरक्षक शासकों का गुणगान किया और अन्य शासकों की निंदा की।

 इतिहास लिखते समय वह यथासंभव अपने को पूर्वाग्रहों से मुक्त रखने का प्रयत्न करता है। सच्चे इतिहासकार अतीत का वर्णन करते समय उस वर्णन पर आधुनिक संकल्पनाओ को थोपने का प्रयत्न नहीं करता। आधुनिक इतिहास का अतीत की विचारधारा का ध्यान रखकर अपने मन में उस काल का परिवेश तैयार करता है और उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर उस परिवेश के अनुरूप तत्कालीन समाज का चित्र प्रस्तुत करता है। निपुण इतिहासकार को ऐसा सही चित्र प्रस्तुत करने के लिए सदैव बहुत सतर्क रहना पड़ता है जिससे उसकी व्यक्तिगत विचारधारा से वह चित्र दूषित ना हो जाए।






 

 

 




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